Valuable QuestionCategory: सामान्य ज्ञानवेदांत और बौद्ध दर्शन में क्या अंतर है ?
jaydip asked 12 months ago

What is the difference between Vedanta and Buddhist philosophy?

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Site Default answered 12 months ago

क्योंकि एक वेदांत दर्शन या एक बौद्ध दर्शन जैसी कोई चीज़ नहीं है। शंकर का अद्वैत रामानुज के विशिष्टाद्वैत से काफी अलग है। उसी प्रकार, माध्यमिक और योगाचार दर्शनों में काफी भिन्नता है। इसलिए, सूक्ष्म अंतर दर्शाने के लिए बिंदुवार तुलना संभव नहीं है। हम सतही तौर पर ही चर्चा कर सकते हैं।
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* कार्य-कारण सम्बन्ध
कार्य-कारण सम्बन्ध को लेकर बौद्धों और वेदान्तिओं के दृष्टिकोण भिन्न हैं। बौद्ध प्रतीत्यसमुत्पाद अर्थात कार्य का कारण पर निर्भर उत्पादन के सिद्धांत का पालन करते हैं[1], जबकि वेदांती सांख्य दर्शन का अनुसरण करते हुए सत्कार्यवाद को मानते हैं, जिसके अनुसार उत्पति के पूर्व कार्य का कारण में अस्तित्व विद्यमान होता है।[2] बौद्धों और वेदान्तिओं के कार्य-कारण सम्बन्धी दृष्टिकोण उनके परिवर्तन और निरंतरता की समस्या के हल के तरीके को प्रभावित करता है। वेदांती ब्रह्म अर्थात परम सत्य को शाश्वत एवं अपरिवर्तनशील मानते हैं। जबकि बौद्ध संसार की सभी वस्तुओं को अनित्य मानते हैं (अनित्यवाद)।[3]
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* आत्मा का प्रश्न
बौद्ध शाश्वत एवं अपरिवर्तनशील आत्मा के अस्तित्व को असंभव मानते हैं। व्यक्तित्व की संकल्पना पंचस्कन्ध अर्थात पांच मानसिक-शारीरिक अवयवों के समन्वय (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) के रूप में की जाती है।[4] वेदांत के विभिन्न पंथ या तो आत्मा को ब्रह्म से पूर्णतः अभिन्न (अद्वैत[5]) या ब्रह्म का भाग (विशिष्टाद्वैत[6]) या फिर ब्रह्म पर निर्भर (द्वैत[7]) मानते हैं।
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* शब्द-प्रमाण की वैधता का प्रश्न
बौद्ध सिर्फ दो प्रमाण[8] को वैध मानते हैं — प्रत्यक्ष एवं अनुमान। जबकि वेदांती शब्द को भी एक वैध प्रमाण मानते हैं। इसी के आधार पर वैदिक संहिता एवं उपनिषद् की वैधता स्वीकारी जाती है।
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* मुक्ति
वेदांत एवं बौद्ध दर्शनों की बंधन से मुक्ति की संकल्पना में अंतर है, हालाँकि दोनों बंधन का समान कारण स्वीकारते हैं — अविद्या।
बौद्धों के अनुसार, अविद्या व्यक्तित्व की त्रुटिपूर्ण संकल्पना का कारण है, जिसके परिणामस्वरूप संसार के बंधन (जन्म-मरण का चक्र) की उत्पति होती है। अविद्या के निवारण से बंधन से मुक्ति मिलती है जिसे निर्वाण कहते हैं।
वेदांत के अनुसार जब जीवात्मा को यह अनुभव हो जाए की वह ब्रह्मा से पूर्णतः अभिन्न (अद्वैत) या ब्रह्म का भाग (विशिष्टाद्वैत) या फिर ब्रह्म पर निर्भर (द्वैत) है तो वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।[9]