Valuable QuestionCategory: सामान्य ज्ञानमी टू (#Me Too) कैंपेन क्या है? इसपर आपकी क्या राय है?
Jaydip asked 1 month ago

What is the IME (#Me Too) campaign? What is your opinion on this?

1 Answers
Jaydip answered 1 month ago

(#मी टू) विदेशों में शुरु हुई एक और सोशल मीडिया कैंपेन है जिसके चलते बहुत सारी महिलाएं खुद को इस टैग से जोड़कर अपने साथ हुई शोषण या कोई अनकही सामाजिक अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाए। पश्चिमी देशों में अपने पर हुए अत्याचारों का स्वीकार करना और उसके विरोध अपना मत सबके सामने रखना को सराहा जाता है। और इस कैंपेन द्वारा पूरी दुनिया की हर कोने से महिलाएं अपने खिलाफ होने वाली कहीं अनकही बातें सोशल मीडिया के माध्यम से साझा कर पाई, और एक दूसरे के साथ खड़ी हो पाईं।
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आपको जान कर आश्चर्य होगा कि यह कैंपेन कि शुरूआत सन २००६ से शुरू हुई थी। लेकिन इस आंदोलन को हवा पकड़ी सन २०१७ में जब कई विशिष्ट महिलाओं द्वारा अमरीकी फिल्म जगत के मशहूर प्रायोजक “ हर्वी विंस्टेन” के खिलाफ इसी टैग के दायरे पर यौन शोषण का आरोप लगाया गया। उसके बाद एक एक महिला जुड़ने लगी, सब अपने खिलाफ हुए शारीरिक, मानसिक और यौन शौषण के बारे में इसी टैग में अपना बयान देने लगी। फिर पता चला, दुनिया के बड़े बड़े महिलाएं भी शोषण से परे नहीं है, और बड़े बड़े अभिनेता, नेता, खिलाड़ी, बाबा, गुरु, ऑफिसर आदि बहुत विशेष लोगों की ऐसी घटनाओं में संपृक्ति है।
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लेकिन सबको यह आश्चर्य हुआ कि दुनिया में नारी अत्याचार, घरेलू हिंसा और धर्षण आदि कार्यों में अपना नाम हमेशा ऊंचा रखने वाला भारत की महिलाएं इस कैंपेन से खुद को दूर रखे और कुछ नहीं बोले। एक साल से चल रही इस आंदोलन पर भारतीय नारियों का आवाज ना के बराबर थी। यह दूसरों के लिए आश्चर्य है, लेकिन हम भारतीयों को पता है, कितने आवाज क्यों नहीं उठते। और कितने आवाज उठने पर कैसे दवा दिया जाते, महान भारतीय परम्परा के नाम पर।
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लेकिन फिर हाल ही में हवा मिली जब “ तनुश्री दत्ता, नाना पाटेकर” की ड्रामा आ गई “मी टू” में। कुछ बात यहां साफ कर दें। जबतक सही में पता नहीं चलता क्या हुआ था, तब तक हम तनुश्री या नाना पाटेकर को गाली देना उचित नहीं। दूसरी बात, भले ही यह सेक्सुअल हरासमेंट नहीं था, लेकिन वीडियो से साफ दिख रही कि यह एक निरस्त्र महिला के खिलाफ पूरा गुंडागर्दी और ईगो का प्रदर्शन रहा। इसमें हम तनुश्री के साथ ही खड़े रहेंगे।
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अभी आते है प्रश्न की दूसरी पहलू पर जो पूछता है कि हमारी यह आंदोलन पर क्या राय है?
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देखिए पिछले कुछ दिनों से यह आंदोलन के ख़िलाफ़ बहुत सारी लोगों ने अपना मत रखा की यह नारियों के लिए झूठे आरोप लगाने का आयुध बन गया। लेकिन हमें यह बताए कोई “ मी टू” खाली महिलाओं के लिए लॉक है क्या? आप पुरुष होने के नाते अपने खिलाफ हुए यौन अत्याचारों को को इसमें साझा कीजिए। ज़रा हम भी देखें कितने पुरुष है जिनके साथ बचपन से गलत इशारा, गलत छूना, गलत व्यवहार, शारीरिक यातना हुआ है महिलाओं के द्वारा।
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अगर आपके साथ ऐसा कुछ हुआ नहीं तो क्यों आप किसी और की आवाज को पसंद नहीं कर रहे है शोषण के खिलाफ। क्या आज भी हम उसी समाज में रहते हैं जहां गलती करने वालों से ज्यादा गलती के खिलाफ आवाज उठाने वालों को दोषी माना जाता है? अगर उनके आरोप गलत है तो यह साबित हो जाएगी। फिर आपको लगता है हर एक इन्सान साथ में कैमेरा, रिकॉर्डिंग यंत्र आदि लेकर घूमता है कि उनके साथ कुछ कांड होगा और वो उसकी सबूत लेंगे?
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मी टू आज भी पढ़ी-लिखी और इंटरनेट जानने वाली उन लोगों के पास पहुंचा है जो इसको अपना आवाज बना पाएं हैं। हम तो ऐसे महिलाओं को जानते हैं, जो बस दो वक्त की खाना मिल सके इसलिए सारा अत्याचार सहकर पड़े रहते हैं। हम इसे पुरुषों को भी देखें है जो रोज लड़ाई और घुटन के बाद भी शादी में टिके हुए है ताकि उनका परिवार का नाम खराब न हो, तथा उनके माता-पिता और बच्चों को सही वक्त खाना मिले।
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सोशल मीडिया पर यह आंदोलन अगर एक आवाज बन रहा है तो बनने दीजिए , पर इससे कोई बड़ी सामाजिक परिवर्तन नहीं हो सकता। शोषण और अत्याचार हमारे आस पास होता है और हम सबको पता रहता है। पर कितने उसके खिलाफ लड़ते है। जो भी लड़ते हैं उनको हमारी समाज कितना साथ देता है? इसीलिए तो भारत के कई महिलाएं सामने नहीं आती। दिल की दर्द से समाज का दर्द और बड़ा है यहां। आवाज़ बंद हो तो घर में जीना मुश्किल पर आवाज खुलने पर समाज में जीना मुश्किल हो जाता है उनके लिए।
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* गलती और शोषण नारी पुरुष दोनों के साथ होता है। पुरुष आगे आता नहीं की समाज क्या कहेगा, हँसेगा उसके मर्दानगी पर। नारी आगे आती नहीं की उसकी भविष्य यार परिवार का सम्मान का क्या होगा, हँसेगा समाज।
* दोनों गलत। दोनों की सामाजिक भय गलत। आवाज़ उठाएंगे नहीं तो न्याय मिलेगी नहीं। चाहे मी टू हो या यु टू।